आज का बनिया समाज: कारोबार से दूरी और नौकरी की दौड़, कहां जा रहे हैं हम!
कभी बनिया समाज को व्यापार की रीढ़ कहा जाता था। देश के हर कस्बे, हर गली-मोहल्ले में अगर कोई दुकान दिखती थी तो मालिक बनिया ही होता था। किराना हो, कपड़ा हो, गहना हो या अनाज “बनिया” नाम अपने आप में भरोसे का प्रतीक था। लेकिन आज तस्वीर बदल रही है- बनिया के बेटे दुकान छोड़कर नौकरी की
तरफ जा रहे हैं और अन्य जातियों के युवा कारोबार में उतर रहे हैं। अब बनिया के बच्चे दुकान पर बैठने के बजाय एसएससी, बैंक, रेलवे या प्राइवेट कंपनी की नौकरी की तैयारी में जुटे हैं। माता-पिता भी चाहते हैं कि उनका बेटा किसी जॉब में “सेटल” हो जाए।दिलचस्प बात यह है कि जहां बनिया समाज धीरे-धीरे कारोबार से दूर जा रहा है, वहीं जो समाज पहले नौकरी के लिए मशहूर था जैसे राजपूत, भूमिहार, कायस्थ या ब्राह्मण उनके बच्चे अब बिजनेस और स्टार्टअप में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। पहले किराना, कपड़ा, आटा, सरिया, सीमेंट, जूता या दवा का व्यापार बनिया के हाथों में होता था, अब बिहार और यूपी जैसे राज्यों में गांव से लेकर शहर तक रिटेल से लेकर बड़े होलसेल तक के कारोबार में, यहां तक कि सुपरमार्केट तक में बनिया से ज्यादा दूसरे समाज के लोग बिजनेस में दिखने लगे हैं।
अब गांवों में भी “गुप्ता जी की दुकान” के बगल में “सिंह जनरल स्टोर” “शर्मा हार्डवेयर”, “पांडे कलेक्शन” या “मिश्रा ट्रेडर्स” आम हो गए हैं। वे जोखिम उठा रहे हैं, नया सोच रहे हैं, और बनिया की जगह बिजनेस का चेहरा बनते जा रहे हैं। यानी बिजनेस का मैदान अब सिर्फ बनिया समाज का नहीं रह गया है। कभी बनिया का बच्चा जो दुकान चलाता था, आज वही दूसरे की कंपनी में काम कर रहा है, और जो समाज पहले नौकरी करता था, वही आज बिजनेस का मालिक बन गया है।
बिजनेस से जॉब की ओर झुकाव
जहां पहले बनिया परिवार के बच्चे बचपन से ही स्कूल से लौटने के बाद दुकान पर बैठकर ग्राहक सेवा, हिसाब-किताब, मोलभाव, स्टॉक मैनेजमेंट और बाजार की नब्ज सीखते थे, वहीं अब वही बच्चे कोचिंग संस्थानों में बैंकिंग, रेलवे, एसएससी, सीए या सरकारी नौकरी की तैयारी करते दिखाई देते हैं। उनकी प्राथमिकता बदल गई है- “अपना बिजनेस” अब “अपनी नौकरी” बन चुका है। माता-पिता भी अब यही चाहते हैं कि उनका बेटा किसी सुरक्षित जॉब में हो, चाहे पद छोटा ही क्यों न हो। आज हर माता-पिता की पहली ख्वाहिश है “बेटा किसी नौकरी में लग जाए।”
आज बनिया परिवार के युवाओं को बिजनेस अस्थिर और जोखिम भरा रास्ता लगने लगा है, जबकि नौकरी सुरक्षित। ऐसे में सवाल उठता है कि जिस समाज ने व्यापार को अपना धर्म माना, वही आज बिजनेस से दूर क्यों जा रहा है?
*आखिर ऐसा क्या बदल गया कि बनिया का बेटा मालिक से नौकर बनने को तैयार है?
*आखिर बनिया का बेटा अंबानी-अडानी क्यों नहीं बनना चाहता?
*जिस समाज ने व्यापार की परंपरा को जन्म दिया, वही समाज अब अपने बच्चों को कारोबार से दूर क्यों ले जा रहा है?
*अब बनिया का बेटा बड़ा उद्योगपति बनने का सपना क्यों नहीं देखता?
*क्यों वह अपने बिजनेस को बड़ी कंपनी में बदलने की जगह अन्य कंपनियों में नौकरी करने को प्राथमिकता देता है?
*क्या उसकी सोच में स्थायित्व की चाह, जोखिम से डर और मेहनत से बचने की प्रवृत्ति घर कर चुकी है?
मानसिकता में बदलाव और पारिवारिक प्रभाव
इस सवाल का जवाब शायद हमारी बदलती पारिवारिक मानसिकता में छिपा है। बुजुर्ग लोग अब बिजनेस की दिक्कतों, मार्केट में गिरावट, ग्राहकों की कमी, टैक्स की झंझट या उधारी की परेशानी का जिक्र बार-बार बच्चों के सामने करते हैं। बिजनेस की मुश्किलों का जिक्र इतना होता है कि बच्चे उसे बोझ मान लेते हैं। नतीजा यह होता है कि बच्चे बिजनेस को “टेंशन” समझ नौकरी की तरफ भागने लगते हैं। साफ है घर में अगर रोज ये बात सुनने को मिले कि दुकान में दिक्कत है, ग्राहक नहीं आते, घाटा हो गया तो बच्चा बिजनेस से डरने लगता है।
इससे उसे लगता है कि नौकरी ही सुरक्षित रास्ता है। वो नौकरी को सुरक्षित और इज्जतदार विकल्प के रूप में देखने लगता है। हर महीने मिलने वाली फिक्स सैलरी, बैंक में आने वाला निश्चित अमाउंट और EMI भरने लायक कमाई उसे सुकून देने लगती है। उसे लगता है कि 9 से 5 की फिक्स टाइम वाली नौकरी में आराम है, रिस्क कम है और वीकेंड ऑफ के साथ जिम्मेदारी भी सीमित है। साथ ही समाज में एक “सेक्योर” इमेज भी है। लेकिव सोचने की बात यह है कि जिस परेशानी की बात कर आप बिजनेस से मुंह मोड़ते हैं, वहीं प्रॉब्लम तो बिजनेस शुरू करने वाले दूसरी जाति के लोगों को भी होती है। फिर वो कैसे पैसे वाले बनते जा रहे है?
स्वतंत्रता बनाम सुरक्षा का द्वंद्व
बिजनेस में मेहनत का सीधा फल मिलता है- जितना काम, उतना मुनाफा। नौकरी में चाहे आप कितना भी मेहनत करें, असली फायदा कंपनी या संस्थान को होता है। नौकरी में मालिक कोई और होता है; आप सिर्फ कर्मचारी होते हैं। रिटायरमेंट या उम्र के बाद उस जगह पर आपका कोई अधिकार नहीं रहता। इसके उलट, बिजनेस में आपकी मेहनत आपके नाम की साख बनाती है, इससे आपकी पहचान और संपत्ति दोनों बढ़ती हैं। आप अपने काम को अपने बेटे को सौंप सकते हैं। लेकिन नौकरी में आप चाहकर भी अपने बेटे को अपनी जगह नहीं दे सकते।
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संयुक्त परिवार से एकल परिवार तक की यात्रा
बनिया समाज की एक और परंपरा थी संयुक्त परिवार की। यही व्यवस्था बिजनेस को ताकत देती थी। एक सदस्य खरीद का जिम्मा संभालता, दूसरा बिक्री का, तीसरा अकाउंट्स का और चौथा स्टॉक का। पूरा परिवार एक साथ चलता था. लेकिन अब अधिकांश परिवार एकल हो चुके हैं। अब हर कोई स्वतंत्र रहना चाहता है। परिवार का सामूहिक सहयोग खत्म हो गया है और कारोबार चलाने का बोझ एक व्यक्ति पर आ गया है। ऐसे में जोखिम और तनाव दोनों बढ़ गए हैं।
शिक्षा प्रणाली और सामाजिक दृष्टिकोण
आज के माता-पिता बच्चों को बड़े-बड़े अंग्रेजी स्कूलों में भेजते हैं, जहां से निकलकर वे कॉरपोरेट कल्चर से प्रभावित होते हैं। नामी स्कूलों में उन्हें किताबी ज्ञान तो मिलता है लेकिन “व्यावसायिक समझ” नहीं। इसके साथ ही बचपन से ही उन्हें पढ़ाई के नाम पर घर से दूर रखा जाता है, जिससे पारिवारिक कारोबार से उनका नाता कमजोर हो जाता है। रिश्तेदारी और सामाजिक जुड़ाव कम हो जाता है, और बच्चा इंडिविजुअलिस्ट बन जाता है। वह किसी टीम या पारिवारिक बिजनेस में काम करने के बजाय खुद के लिए सीमित जीवन चुनता है।
शादी-ब्याह में भी ‘नौकरी’ का क्रेज
आज समाज में नौकरीपेशा युवकों की मांग भी बढ़ गई है। शादी-ब्याह के समय लड़कियों के अभिभावक नौकरी को सबसे बड़ा मानदंड मानते हैं। बिजनेसमैन लड़का अगर सफल या काफी पैसा वाला भी हो तो दूसरे नंबर पर आ जाता है। आज विवाह के समय पहला सवाल यही होता है “लड़का क्या करता है?” और जवाब अगर “नौकरी उसमें भी सरकारी” है तो रिश्ता तुरंत पक्का, लेकिन अगर “बिजनेस करता है” तो अगला सवाल आता है — “बिजनेस कैसा है, क्या कमाई है, मेहनत कितना है?” यह सामाजिक दृष्टिकोण भी युवाओं को बिजनेस से दूर कर रहा है। क्योंकि उन्हें लगता है कि बिजनेस करने वाले को समाज में उतनी इज्जत नहीं मिलती जितनी “नौकरीपेशा” को।
सोच में बदलाव की जरूरत
यह परिवर्तन सिर्फ रोजगार की दिशा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और मानसिक बदलाव है। अगर यही रुझान जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में बनिया समाज का व्यापारिक वर्चस्व इतिहास बन जाएगा। इसलिए नई पीढ़ी को यह समझाना जरूरी है कि बिजनेस केवल दुकानदारी नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, नवाचार और सृजन का मार्ग है। जोखिम हर काम में है लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि बिजनेस में मेहनत का फल आपके नाम होता है, जबकि नौकरी में वह किसी और के नाम लिखा जाता है। नौकरी में चाहे आप CEO बन जाएं, आखिरकार आप किसी के नौकर ही रहते हैं। लेकिन चाहे कितना भी छोटा हो बिजनेस में आप खुद मालिक होते हैं अपना समय, अपनी मेहनत, अपना भविष्य तय करते हैं। बनिया समाज को अब यह सोचना होगा कि क्या वह “सेलरी” के पीछे दौड़ता रहेगा या फिर “साख” बनाने का पुराना गौरव फिर से प्राप्त करेगा।
नौकरी बनाम बिजनेस- असली फर्क क्या है?
*नौकरी में जितनी मेहनत करेंगे, फायदा किसी और को होगा। बिजनेस में जितनी मेहनत करेंगे, फायदा आपका होगा।
*नौकरी में आप रिटायर होंगे, बिजनेस में आप विरासत छोड़ेंगे।
*नौकरी में आप अपने बेटे को जगह नहीं दे सकते, लेकिन बिजनेस में आप उसे “मालिकाना हक” दे सकते हैं।
*नौकरी में आपके नाम से कोई याद नहीं रखता,बिजनेस में आपकी साख पीढ़ियों तक चलती है।
इसलिए हमेशा याद रखिए नौकरी में आपकी मेहनत किसी और के सपने को पूरा करती है, लेकिन बिजनेस में आपकी मेहनत आपका और आपके परिवार का भविष्य बनाती है। आपके दादाजी या देश के सभी उद्योगपतियों ने जो अपनी साख बनाई है, वो सिर्फ कारोबार से बनी है, किसी पद या सैलरी से नहीं। अब वक्त है कि आप भी उस परंपरा को आगे बढ़ाएं क्योंकि बनिया सिर्फ दुकान चलाने वाला नहीं, देश की अर्थव्यवस्था चलाने वाला है। इसलिए अब वक्त है कहने का- हम नौकरी नहीं, “मालिक” बनने के लिए पैदा हुए हैं।
बनिया एक जाति नहीं, एक सोच
बनिया सिर्फ एक जाति नहीं, एक सोच है- लाभ और प्रगति की सोच। बनिया मतलब कुछ बनिए... यानी बनिया हैं तो कुछ बनकर दिखाइए। अगर आप अपने बिजनेस को आधुनिक तरीके से, आज के तरीके से, टेक्नोलॉजी, ई-कॉमर्स, डिजिटल मार्केटिंग और ब्रांडिंग के साथ आगे बढ़ाएंगे तो आप भी “छोटे बनिया” से “बड़े उद्योगपति” बन सकते है। तो आप भी अपने खानदानी हुनर को आधुनिक साधनों को जोड़िए और थोड़ा जोखिम उठाइए। और फिर देखिए सारा जहां आपके स्वागत के लिए तैयार है।
इसपर आपका क्या सोचना है नीचे कंमेंट कर जरूर बताइएगा...
-हितेन्द्र गुप्ता
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बहुत सुंदर 🪷 सहमत ❤️
ReplyDeleteधन्यवाद आपका
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