क्या हम खुद अपने बच्चों को बिजनेस से दूर कर रहे हैं? आखिर बनिया अपने बच्चे को धंधे से कैसे जोड़कर रखे?
आज हमारे बनिया-वैश्य समाज के हर घर की कहानी करीब-करीब एक जैसी हो गई है। घर पर पुश्तैनी लाखों का कारोबार है, नौकर-चाकर हैं, पर घर का चिराग, घर से हजारों मील दूर किसी शहर में फाइल लेकर बॉस के आगे-पीछे चक्कर काट रहा है। वह अपना जमा-जमाया बिजनेस छोड़, कुछ हजार की नौकरी के पीछे भाग रहा है। कंपनी के दिए टार्गेट पूरे करने के लिए कंप्यूटर की स्क्रीन पर दिन-रात आंखें गड़ाए बैठा है और किराए के एक छोटे से मकान में जिंदगी बसर कर रहा है। अगर अपना मकान-गाड़ी ले भी ली, तो EMI के चक्कर में रिटायर होने तक गुलामी करने को मजबूर है।
हैरानी की बात यह है कि महीने की आखिर में उसे जितनी सैलरी मिलती है, उससे ज्यादा तो हमारे घर पर कारोबार में एक दिन का मुनाफा निकल आता है। इस सबके बावजूद, अगर बेटा दूर शहर में अकेले रहकर खुश भी है, तो घर पर बैठा पिता इस चिंता में घुला जा रहा है कि जिस दौलत-संपत्ति को दिन-रात एक करके 'अरजा' (कमाया), उसे अब संभालेगा कौन? क्या इसी दिन के लिए जी-जान लगाकर यह साम्राज्य खड़ा किया था? रहने को पांच-सात कित्ते का मकान बना दिया, दस-बीस बीघा जमीन जोड़ दी, इतना धन संचित कर दिया कि पांच-सात पुश्तें बैठकर खा सकें। घर पर सब कुछ है, फिर भी चिराग पास नहीं जल रहा। जिस बने-बनाए बिजनेस को बेटा नई ऊंचाइयों पर ले जा सकता था, उसे छोड़कर वह नौकरी की 'पेंसन' और 'सिक्योरिटी' के पीछे भाग रहा है।
आज हमारे बच्चों को यह साफ-साफ बताने की जरूरत है कि बेटा, जिस 40-50 हजार की नौकरी में तुम्हें सुकून दिख रहा है, वह दरअसल एक 'सोने का पिंजरा' है। एक बार इसमें फंसे, तो फिर निकलने का रास्ता नहीं मिलेगा। हमेशा के लिए नौकर वाली मानसिकता के गुलाम हो जाओगे। एक बंधी-बंधाई रकम में जिंदगी गुजार दोगे, जबकि अपनी दुकान पर आज अगर तुम्हें 20 हजार का मुनाफा दिख रहा है, तो वहां कल 20 लाख कमाने का भी रास्ता खुला है।
अब सवाल यह उठता है कि आपका लड़का बिजनेस में लाखों कमा सकता है, फिर भी वह नौकरी क्यों चुन रहा है? इसके लिए सिर्फ आपका बेटा ही नहीं, काफी हद तक आप खुद भी जिम्मेदार हैं। याद कीजिए, जब आप दुकान या धंधे से थककर घर आते हैं, या किसी मुंडन, शादी-ब्याह, या समाज की सभा में चार भाइयों के साथ बैठते हैं, तो क्या बातें करते हैं? बस, अपना रोना शुरू कर देते हैं। आपका वही पुराना घिसा-पिटा रिकॉर्ड चालू हो जाता है- "अब बिजनेस में वो लज्जत नहीं रही... अब वैसी कमाई नहीं है... बड़ी परेशानी है... बहुत माथापच्ची है।"
आपकी ये नकारात्मक बातें जब आपके पास खड़ा आपका बेटा सुनता है, तो उसके मन में बिजनेस के प्रति नफरत पैदा होने लगती है। उसका मन उचाट हो जाता है। जब वह आपको हमेशा परेशान और चिड़चिड़ा देखता है, तो वह सोचने लगता है कि इससे तो अच्छा है 9 से 6 की ड्यूटी करो और महीने के आखिर में चैन की सैलरी पाओ। आपने अनजाने में ही उसके मन में बिजनेस को एक 'झंझट' बना दिया।
जब कोई आपसे पूछता है- "सेठ जी, काम-काज कैसा चल रहा है?" तो आप तपाक से बोलते हैं- "बस जी, कट रही है... बाजार बहुत मंदा है... कॉम्पिटीशन इतना है कि एक-आध परसेंट पर काम करना पड़ रहा है।" आपकी यही 'मंदी वाली बातें' बच्चों का मोहभंग कर देती हैं। बाजार में प्रतियोगिता तो हमेशा रही है, पर हमारा बनिया समाज तो वो है जो मरुस्थल में भी कुआं खोदकर पानी निकाल लेता था। आज अगर कॉम्पिटीशन है, तो धंधा बंद हो गया है क्या?
जरा बाजार में निकलकर तो देखिए, हर तरफ कुछ न कुछ नया हो रहा है। रोज नए मॉल खुल रहे हैं, बड़े-बड़े शोरूम और आउटलेट का उद्घाटन हो रहा है। अगर धंधा मंदा है, तो ये सब कौन खोल रहा है? किसी को इसमें फ्यूचर दिख रहा है, तभी तो शुरू कर रहा है। अंबानी से लेकर अडानी जैसे बड़े अरबपति आज आपके किराना कारोबार में हाथ आजमा रहे हैं। वे सुपरमार्केट खोलकर, भारी डिस्काउंट देकर भी मुनाफा कमा रहे हैं। फिर आप बिना डिस्काउंट के, सीधे MRP पर सामान बेचकर भी क्यों नहीं कमा पा रहे? सोचिए, कमी बिजनेस में नहीं, आपके तरीके में है।
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हैरानी तो तब होती है जब हम देखते हैं कि बनिया-वैश्य समाज के बच्चे बिजनेस छोड़ रहे हैं, और दूसरी जातियों के बच्चे- चाहे वो भूमिहार हों, कायस्थ हों, ब्राह्मण हों या कुर्मी-कोइरी- वे नौकरी छोड़कर स्टार्टअप और बिजनेस में उतर रहे हैं। यह कैसी विडंबना है? जिन्हें बिजनेस का 'ब' नहीं पता, वे सफल हो रहे हैं, और जो धंधे के उस्ताद हैं, वे इसे 'बाय-बाय' कह रहे हैं। आप तो बाप-दादा के जमाने से गद्दी संभाल रहे हैं, आपकी रगों में बिजनेस का दांव-पेंच है, फिर यह वैराग्य कैसा?
जो लोग कहते हैं कि अब बिजनेस का जमाना नहीं रहा, उन्हें शायद अपनी ताकत का अंदाजा नहीं है। 'बनिया' शब्द ही 'बिजनेस' से बना है। बनिया मतलब- जो कुछ 'बने' और कुछ 'बनाकर' दिखाए। जो काम दुनिया के लिए पहाड़ है, वह हमारे लिए रोज का काम है। मुश्किलें सिर्फ उनके लिए हैं जिन्होंने सीखना बंद कर दिया है और जो आज भी 'बैलगाड़ी' वाले ढर्रे पर बिजनेस करना चाहते हैं। जब जमाना नया है, तो तरीका पुराना क्यों? रिस्क लीजिए, नयापन लाइए। जब बिड़ला, अंबानी, मित्तल और बंसल जैसे हमारे भाई जमाने के साथ ताल से ताल मिलाकर बढ़ सकते हैं, तो आप क्यों नहीं?
आज की दुनिया 'स्पीड' की है। पहले गद्दी पर बैठकर लाल बहीखाते- चोपटा में हिसाब होता था, अब सब कुछ मोबाइल और क्लाउड पर है। पहले ग्राहक दुकान पर आता था, अब दुकान को ग्राहक के घर पहुंचना पड़ता है। सवाल यह नहीं है कि हम टिक पाएंगे या नहीं, सवाल यह है कि क्या हम अपनी उस 'बनिया बुद्धि' को नई तकनीक के सांचे में ढालने को तैयार हैं? कई लोग ऑनलाइन कंपनियों को कोसते हैं कि ऑनलाइन वालों ने हमारा काम खराब कर दिया। जबकि उन्होंने तो हमें काम का नया तरीका सिखाया है। अगर ग्राहक घर बैठे सामान चाहता है, तो उसे होम-डिलीवरी दीजिए। डिजिटल मार्केटिंग अपनाइए। अपना खाता-बही कंप्यूटर पर लाइए।
आपके बच्चे तकनीक के दीवाने हैं। उन्हें मोबाइल और कंप्यूटर आपसे बेहतर आता है। उनकी इस ताकत को बिजनेस का हथियार बनाइए। उनसे कहिए- बेटा, मुझे तकनीक नहीं आती, तू देख कि हमारी दुकान का सामान फेसबुक या व्हाट्सएप के जरिए कैसे बिक सकता है। जब आप उन्हें जिम्मेदारी और सम्मान देंगे, तो उनका मन बिजनेस में लगने लगेगा। वह नए सॉफ्टवेयर लाएगा, हिसाब-चुस्त करेगा और जब वह देखेगा कि उसके एक व्हाट्सएप स्टेटस से 20-25 प्रतिशत तक बिक्री बढ़ गई, तो उसे बिजनेस में 'ग्लैमर' दिखने लगेगा।
अपने बच्चों को सिर्फ दुकान चलाना मत सिखाइए, उन्हें 'डेटा' और 'मार्केटिंग' की ट्रेनिंग दिलाइए। आज दरभंगा, मधुबनी, पटना, लखनऊ जैसे शहरों में भी लोग एसी, सीसीटीवी और बिलिंग मशीन लगाकर दुकानदारी कर रहे हैं। आप भी अपनी दुकान को मॉडर्न लुक दीजिए। पेमेंट के लिए हर डिजिटल तरीका (UPI, Card) रखिए। दुकान को ऐसा बनवाइए कि आपके पढ़े-लिखे बेटे को वहां बैठने में शर्म नहीं, बल्कि गर्व महसूस हो। उसे लगना चाहिए कि वह एक 'बिजनेस ओनर' है, न कि सिर्फ एक दुकानदार।
अक्सर हम बच्चों को बचपन में डांटते हैं "ठीक से पढ़ ले, नहीं तो इसी दुकान पर बैठना पड़ेगा।" बस, यहीं से बीज गलत पड़ जाता है। उसे लगता है कि दुकान पर बैठना एक सजा है। इसकी जगह उसे यह कहिए "खूब मन लगाकर पढ़, ताकि तू अपनी इस छोटी सी दुकान को एक बड़ी कंपनी या मल्टीनेशनल ब्रांड बना सके।" इससे वह शुरू से ही उसे बड़ा करने के बारे में सोचने लगेगा। उसके मन मे ये बसाना होगा कि अपना बिजनेस कोई मजबूरी नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ा अवसर है।
इसके साथ ही उसे बचपन से ही पैसे की 'ताकत' और 'कीमत' दोनों समझाइए। स्कूल गणित सिखाता है, पर बनिया बाप 'व्यापार' सिखाता है। उसे गुल्लक से शुरुआत कराइए और निवेश का महत्व बताइए। उसे समझाइए कि 100 रुपये कमाना तो मेहनत है, पर उस 100 से 200 बनाना 'कला' है। बनिया समाज की सबसे बड़ी सीख यही है "जो बचाया, सो कमाया।" उसे छोटे-छोटे मुनाफे का स्वाद चखने दीजिए। डेड स्टॉक निकालने के लिए उसे लालच दीजिए कि "बेटा, जो तू बिकवा देगा, उसका आधा मुनाफा तेरा।" फिर देखिए, उसका दिमाग कैसे घोड़े की तरह दौड़ता है। यहीं से उसके अंदर एक बिजनेसमैन का जन्म होगा।
इसी तरह बच्चे को थोड़ा लचीला होकर 'सीड कैपिटल' (शुरुआती पूंजी) दीजिए। उसे छोटे-मोटे रिस्क लेने दीजिए। अगर वह कोई नया प्रयोग करना चाहता है, तो उसे टोकिए मत। अगर वह फेल भी हो जाए, तो डांटिए मत। उसे सिखाइए कि फेल होना मतलब यह जानना है कि यह तरीका काम नहीं करता। उसे आपदा को अवसर में बदलना सिखाइए। जब उसे अपनी मेहनत का फल दिखेगा, तो वह खुद ही नौकरी के ख्याल छोड़ देगा।
बिजनेस में उसे रमाने से पहले एक बात जरूर समझाइए कि कारोबार में सबसे बड़ी चीज होती है 'साख'। उसे समझाइए कि आज के जमाने में जिसे लोग 'ब्रांड वैल्यू' कहते हैं, वह असल में हमारी 'जुबान की कीमत' है। ग्राहक सिर्फ सामान नहीं, आपका भरोसा खरीदता है। एक बार भरोसा टूटा, तो साम्राज्य गिरते देर नहीं लगती। उसे बताइए कि ग्राहक के साथ कभी धोखाधड़ी नहीं करनी। अगर हमने एक बार खराब सामान दे दिया, तो शायद हम उससे 100 रुपये अधिक भले कमा लें, लेकिन हम एक ग्राहक हमेशा के लिए खो देंगे।
हमेशा उसके रचनात्मक सोच और नए विचारों को हमेशा बढ़ावा दें। असफल होने पर उसे डांटेंगे तो वह आपका बिजनेस छोड़ आपसे दूर चला जाएगा फिर बुढ़ापे में आपको उसकी कमी खलेगी। फिर कहिएगा कि लाखों का कारोबार और कोई देखने वाला नहीं। आपके लिए ये जरूरी नहीं है कि आपका बेटा विदेश में रहकर लाखों की सैलरी वाला जॉब करे, बल्कि ये ज्यादा जरूरी है कि वो भले ही कम पैसे का बिजनेस करे, लेकिन आपके पास रहे और रात का खाना आपके साथ मिलकर खाए।
नौकरी करना कोई बुरा काम नहीं है, लेकिन किसी और के सपने को पूरा करने के लिए अपनी पूरी जिंदगी खपा देना समझदारी नहीं है। अपने बच्चे को यह अहसास दिलाइए कि नौकरी में वह किसी और के सपने के लिए अपनी जवानी खपा रहा है। भले ही वहां वह एक नंबर पर हो, रिटायर होने से एक दिन पहले भी उसे, एक छोटी-सी गलती के लिए निकाला जा सकता है। नौकरी में आप अपने बच्चें को अपना पद नहीं दे सकते। लेकिन बिजनेस में आप एक ऐसा 'सिस्टम' बनाते हैं, जहां पैसा आपके लिए काम करता है। और वो सिस्टम आपकी अगली पीढ़ियों को भी पाल देगा। नौकरी आपको ऊपर से अमीर दिखा सकती है, लेकिन असल में अमीर बिजनेस ही बनाता है। नौकरी में आप अपना 'वक्त' बेचते हैं, बिजनेस में आप वक्त को 'कमाते' हैं।
आपको अपने बच्चे को समझाना होगा कि नौकरी में वेतन की एक सीमा होती है, लेकिन व्यापार में कमाने की कोई सीमा नहीं होती। आप जितना मेहनत करेंगे, उतनी ज्यादा कमाई होगी। आप एक दुकान से बिजनेस शुरू कर उसे अपना ब्रांड बना सकते हैं। उसे कई राज्यों तक पहुंच सकते हैं। देश-विदेश में फैला सकते हैं। जबकि नौकरी में आप जिस किसी ब्रांड को आगे बढ़ाएंगे, वो आपका अपना नहीं होगा, किसी और का होगा। महीने के अंत में मिलने वाली सैलरी आपको सुरक्षित महसूस करा सकती है, लेकिन वह आपको कभी आजाद नहीं कर सकती। जबकि बिजनेस आपको वह पंख देता है, जिससे आप जितनी चाहें उतनी ऊंची उड़ान भर सकते हैं।
उसे सामाजिक रिश्तों और नेटवर्किंग की अहमियत समझाइए। उसे अपने साथ सभाओं और बैठकों में ले जाइए। उसे बड़ों से बात करने के सलीके और रिश्तों के महत्व के बारे में बताइए। बनिया समाज की सबसे बड़ी ताकत उसका आपसी भाईचारा और नेटवर्क है। आपका नेटवर्क जितना बड़ा होगा आपका काम उतनी आसानी से होगा।
उसे पैसे का महत्व बताइए। उसे बताइए कि 'लक्ष्मी' के बिना 'लक्ष्य' अधूरा है। जीवन में भव्यता-दिव्यता लक्ष्मी से ही आती है। जीवन की 90 प्रतिशत समस्याओं का हल पैसा है। अच्छी शिक्षा, इलाज, घूमना-फिरना, तीर्थयात्रा और समाज सेवा सब कुछ पैसे से ही संभव है। पैसा रहने पर बच्चों की शादी, रिसेप्शन से लेकर सभी कर्म संस्कार तक भव्यता और दिव्यता के साथ धूमधाम से कर सकेगें। जब बनिया समृद्ध होता है, तो पूरा समाज फलता-फूलता है। इतिहास गवाह है कि ज्यादातर स्कूल, अस्पताल और धर्मशालाएं बनियों के दान से ही खड़ी हुई हैं। आप जितना ज्यादा कमाएंगे, उतना ज्यादा समाज के लिए कुछ कर पाएंगे।
आपके पास पैसा रहेगा तो बच्चे का एडमिशन बड़े स्कूल में करा सकेंगे। बीमार पड़ने पर बड़े अस्पताल में इलाज करा सकेंगे। इमरजेंसी पड़ने पर पैसे का आसानी से इंतजाम कर पाएंगे। पैसा रहेगा तो दस लोगों में आपकी पूछ रहेगी। पैसा रहेगा तो समाज में मान-सम्मान मिलेगा। दस लोग जी-हजूरी करेंगे और आपका कोई काम नहीं अटकेगा। पैसा रहेगा तो बच्चों को वो हर सुख-सुविधा प्रदान कर सकेंगे, जो कभी आपको नहीं मिला। पैसा आपके लिए अवसरों के कई दरवाजे खोलता है। साफ है कि पैसा हमें अपने सपनों को पूरा करने की शक्ति देता है और ढेर सारा पैसा चाहिए तो वो बिजनेस से मिलेगा।
इतना ही नहीं पैसा सिर्फ विलासिता नहीं, पावर भी है। पैसा है तो मान-सम्मान है, पैसा है तो प्रशासन और सरकार भी आपकी बात सुनती है। टाटा, बिड़ला, अंबानी, अडानी जैसे लोग पैसे के दम पर ही देश और दुनिया की दिशा तय करते हैं। इसलिए उसे बताइए कि 'जॉब सीकर' नहीं, 'जॉब क्रिएटर' बने। इससे इलाके में उसका भौकाल बना रहेगा।
याद रखिए, नौकरी से सिर्फ पेट पलता है, लेकिन व्यापार से 'कुल' और 'पुश्तें' चलती हैं। अपने बच्चों के मन में वह आग जलाइए कि वे किसी के नीचे काम करने के लिए नहीं, बल्कि मालिक बनने के लिए पैदा हुए हैं। अपनी जड़ों की ओर लौटिए, तकनीक का हाथ थामिए और विश्वास रखिए कि आपकी आने वाली पीढ़ी आपका नाम रोशन करेगी।
जय कमलापुरी! तरक्की की राह पर कदम बढ़ाइए, सफलता आपके कदम चूमेगी।
इसपर आपका क्या सोचना है नीचे कंमेंट कर जरूर बताइएगा...
- हितेन्द्र गुप्ता
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