बेटी को सेठ नहीं, साहब चाहिए- क्या शादियों के चक्कर में बनिया का बेटा नौकर बनने को मजबूर है?
आज हम एक ऐसी कड़वी सच्चाई पर बात करने जा रहे हैं, जिसे हम सब महसूस तो कर रहे हैं, पर खुल कर बोल नहीं पा रहे। आज हमारे बनिया-वैश्य समाज के सामने एक अजीब सा संकट खड़ा हो गया है। संकट धंधे का नहीं, संकट मंदी का भी नहीं, बल्कि संकट है हमारे वंश और हमारी विरासत को बचाने का।
आज के दौर में एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा हो गया है- 'बेटी को सेठ नहीं, साहब चाहिए'। जी हां, यही वह हकीकत है जिसने हमारे समाज के मजबूत व्यापारिक
शादी की मंडी में 'सेठ' पिछड़ा और 'साहब' जीता
आजकल हमारे समाज में एक अलग ही हवा चल रही है। किसी भी शादी-ब्याह के समारोह में चले जाइए, वहां चर्चा यही होती है कि फलां का लड़का तो अपनी दुकान पर बैठता है, लाखों की कमाई है पर उसके लिए कोई लड़की वाला हाथ नहीं बढ़ा रहा। वहीं दूसरी तरफ, एक लड़का जो शहर जाकर किसी कंपनी में 40-50 हजार की नौकरी कर रहा है, उसके दरवाजे पर रिश्तों की लाइन लगी है।
लड़की के परिवार वाले आज 'बिजनेस' का नाम सुनते ही पीछे हट जाते हैं। उन्हें लगता है कि बिजनेसमैन लड़का मतलब- दिन भर दुकान की चिक-चिक, ग्राहकों की भीड़, समय की कमी और अनिश्चित कमाई। भले ही लड़का अपनी दुकान से महीने के 2 लाख कमा रहा हो, लेकिन लड़की वालों को वह 50 हजार की सैलरी वाला 'साहब' ज्यादा पसंद आता है, जिसकी नौकरी में 'ठप्पा' लगा हो।
यही वह सबसे बड़ा कारण है कि आज के लड़के अपने पापा के जमे-जमाए कारोबार को लात मार रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि अगर समाज में इज्जत पानी है और एक सुंदर पढ़ी-लिखी बहू घर लानी है, तो 'सेठ' बनकर काम नहीं चलेगा, 'साहब' बनना ही पड़ेगा।
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विरासत बनाम विलासिता: एक बड़ी भूल
आजकल लड़कियों के मां-बाप को लगता है कि नौकरी वाला लड़का अगर दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे बड़े शहर में है, तो उनकी बेटी का जीवन 'हाई-फाई' होगा। उसे घूमने-फिरने की आजादी होगी और वह बड़े मॉल और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में जाकर अपनी फोटो सोशल मीडिया पर डालेगी। उन्हें लगता है कि बिजनेसमैन लड़का तो सुबह 9 बजे दुकान खोल देगा और रात के 9 बजे तक वहीं फंसा रहेगा।
लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि नौकरी वाला लड़का भले ही दिखने में 'साहब' हो, पर वह असल में अपनी कंपनी और अपने बॉस का बंधुआ मजदूर है। उसकी छुट्टी बॉस तय करता है, उसकी तरक्की बॉस की मर्जी पर है। वहीं दूसरी तरफ, बिजनेस करने वाला लड़का अपनी मर्जी का मालिक है। अगर घर में कोई खुशी हो या कोई मुसीबत आए, तो वह तुरंत दुकान का शटर गिराकर परिवार के साथ खड़ा हो सकता है। नौकरी वाला लड़का शायद पिता की आखिरी विदाई में भी 'लीव एप्लीकेशन' मंजूर होने का इंतजार करता रह जाए।
समाज की दोहरी मानसिकता का शिकार होते बेटे
जब बनिया समाज की कोई मीटिंग होती है, तो हम बड़े गर्व से कहते हैं कि हम देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। हमारे इलाके से इतना जीएसटी जाता है, लेकिन जब अपनी ही बेटी का हाथ किसी कर्मठ बिजनेसमैन लड़के के हाथ में देने की बात आती है, तो हम बगलें झांकने लगते हैं। हम खुद ही अपने बेटों के मन में यह हीन भावना भर रहे हैं कि 'बिजनेस करना' मतलब 'कम पढ़ा-लिखा' होना या 'पिछड़ा' होना है।
लड़के देखते हैं कि उनके पिता ने दिन-रात एक करके जिस शोरूम को खड़ा किया, आज उसी शोरूम की गद्दी पर बैठने के कारण उन्हें शादी के बाजार में 'रिजेक्ट' किया जा रहा है। यह अपमान उनसे सहा नहीं जाता। फिर वे अपनी उस 'बनिया बुद्धि' का गला घोंट देते हैं और किसी कॉर्पोरेट ऑफिस की भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं। क्या हमने कभी सोचा है कि जब हमारे सारे होनहार लड़के नौकरी करने चले जाएंगे, तो हमारी ये आलीशान दुकानें और बाजार क्या गैर-बनिया लोग संभालेंगे? आजकल ये होने भी वाला है, गैर-बनिया बिजनेस में बनिया से आगे बढ़ते जा रहे हैं।
ज्वाइंट फैमिली का टूटना और एकाकी जीवन का मोह
इस समस्या की जड़ हमारे बदलते परिवारों में छिपी है। याद कीजिए वो दौर, जब हमारे बनिया समाज में ज्लाइंट फैमिली का बोलबाला था। घर में दस लोग होते थे, तो खुशियां भी दस गुना होती थीं। ज्वाइंट फैमिली में कारोबार का बोझ किसी एक पर नहीं होता था। कोई दुकान संभालता, तो कोई मंडी से माल लाता, तो कोई हिसाब-किताब देखता।
आजकल की लड़कियां कहती हैं कि उन्हें 'प्राइवेसी' चाहिए, उन्हें अकेले रहना है। मां-बाप भी कहते हैं कि 'बेटी सुखी रहेगी।' लेकिन क्या सच में अकेले रहना सुख है? ज्वाइंट फैमिली तो एक इंश्योरेंस की तरह होती है। अगर बच्चा बीमार हो, तो दादी-चाची संभालने वाली होती हैं। अगर घर में कोई फंक्शन हो, तो दस हाथ मदद के लिए बढ़ते हैं।
अगर परिवार में किसी एक की तबीयत खराब हुई या कोई नुकसान हुआ, तो बाकी भाई और बुजुर्ग ढाल बनकर खड़े हो जाते थे। घर की महिलाएं भी मिल-जुलकर घर संभालती थीं और कभी-कभी तो दुकान के मैनेजमेंट में भी हाथ बंटा देती थीं। तब हम दो, हमारे दो नहीं, बल्कि हम सब, हमारा पूरा कुनबा वाला हिसाब था।
लेकिन आज? आज सिंगल फैमिली का भूत सबके सिर चढ़कर बोल रहा है। सबको अपनी अलग दुनिया चाहिए। किसी को किसी से कोई लेना-देना नहीं। आज के लड़के-लड़कियां अकेलेपन में मस्त हैं। सिंगल फैमिली में रहने के कारण एक-दूसरे का ख्याल रखने और सहयोग करने की भावना ही खत्म हो गई है।
इसके साथ ही नौकरी वाले लड़के के साथ अकेले शहर में रहने वाली लड़की का हाल देखिए- अगर उसे बुखार भी आ जाए, तो पति को ऑफिस से छुट्टी लेनी पड़ती है या फिर उसे खुद ही बीमार हालत में चूल्हा जलाना पड़ता है। वहां न कोई सिर पर हाथ फेरने वाला होता है, न कोई सांत्वना देने वाला। बिजनेस वाले संयुक्त परिवारों में यह जो सुरक्षा का भाव है, उसे आज की पीढ़ी 'बोझ' समझ रही है, जो कि सबसे बड़ी नासमझी है।
आजादी के चक्कर में बिखरती मर्यादाएं
सिंगर फैमिली में क्या होता है? सिर्फ दो-चार लोग। जब मन हुआ उठे, जब मन हुआ खाया। अगर पत्नी का खाना बनाने का मन नहीं है, तो तुरंत मोबाइल से ऑनलाइन खाना मंगा लिया। ये जो 'जब मन हो तब करो' वाली आजादी है, इसने हमारी नई पीढ़ी को अनुशासन से दूर कर दिया है।
अकेले रहने की आदत के कारण आज की लड़कियां ज्वाइंट फैमिली में एडजस्ट ही नहीं कर पातीं। उन्हें लगता है कि अगर बड़े परिवार में गईं, तो उन्हें सुबह जल्दी उठना पड़ेगा, सबके लिए चाय-नाश्ता और खाना बनाना पड़ेगा और सबकी मर्जी के हिसाब से चलना पड़ेगा। उन्हें ये एक 'कैद' की तरह लगता है।
आजकल की लड़कियों को बचपन से ही घर और बाहर पूरी आजादी मिलती है। जो मन में आया पहना, जहां मन हुआ घूमे। ज्वाइंट फैमिली में ये सब थोड़ा मुश्किल होता है क्योंकि वहां परिवार की एक मर्यादा होती है। यही कारण है कि लड़कियां और उनके माता-पिता बिजनेस वाले लड़के से शादी करने से कतराते हैं, क्योंकि बिजनेस करने वाला लड़का अक्सर अपने परिवार के साथ ही रहता है।
नौकरी वाला लड़का और 'आसान' जिंदगी का लालच
जब लड़की की शादी की बात आती है, तो मां-बाप की पहली पसंद नौकरी वाला लड़का क्यों होता है? इसके पीछे एक बहुत बड़ी 'सेटिंग' है। मां जानती है कि उसकी बेटी को ज्यादा कामकाज नहीं आता। आजकल की इंग्लिश मीडियम स्कूलों की पढ़ाई ने लड़कियों को किताबों में तो उलझा दिया, पर घर के चूल्हे-चौके से दूर कर दिया। कई लड़कियां तो ब्रेड-बटर या मैगी खाकर दिन गुजार लेती हैं।
अब अगर ऐसी लड़की किसी बड़े बिजनेसमैन परिवार में जाएगी, जहां सुबह से शाम तक रसोई चलती है, तो उसका क्या हाल होगा? इसीलिए मां-बाप सोचते हैं कि बेटा अगर नौकरी वाला होगा, तो वो शहर से बाहर रहेगा। बाहर रहेगा तो अकेला रहेगा। वहां मेरी बेटी राज करेगी।
नौकरी वाले लड़के के साथ रहना आसान है। लड़का ऑफिस चला गया, लड़की ने कभी ब्रेड खा लिया, कभी दलिया बना लिया। कभी मन हुआ तो पास्ता या मैगी खिलाकर पति को ऑफिस विदा कर दिया। शाम को पति आया तो बाहर होटल में खाना खा लिया। न सास की सेवा का बोझ, न जेठानी-देवरानी का झंझट। बस, यही 'शॉर्टकट' वाली जिंदगी आज के रिश्तों का आधार बन गई है।
पढ़ाई का बोझ और कामकाज से दूरी
हमें इस बात पर भी गौर करना होगा कि हमारे बच्चों की पढ़ाई उन्हें अपनी जड़ों से काट रही है। भारी-भरकम फीस, ऊपर से प्रोजेक्ट, होमवर्क और सेमेस्टर परीक्षा। बच्चे सुबह जाते हैं और शाम को थक-हारकर लौटते हैं। उनके पास घर के कामों में हाथ बंटाने का समय ही नहीं है। जब वे बचपन से घर का कोई काम नहीं करेंगे, तो आगे जाकर बड़े परिवार की जिम्मेदारी कैसे उठाएंगे?
यही वजह है कि जब शादी की बात आती है, तो ये बच्चे बिजनेस परिवार के नाम से ही कांपने लगते हैं। उन्हें लगता है कि बिजनेस परिवार में जाने का मतलब है- घर के काम की चक्की में पिस जाना। उन्हें लगता है कि वहां उन्हें सिर्फ खाना बनाना और कपड़े धोना ही पड़ेगा। इस डर के कारण वे दस बार सोचते हैं।
जब घर में बेटी बड़ी होती है, तो उसे घर के काम से यह कहकर दूर रखा जाता है कि "बेटी पढ़ रही है, उसे परेशान मत करो।" नतीजा यह होता है कि वह बड़ी होकर घर की जिम्मेदारियों को 'आफत' मानने लगती है। जब वह शादी के लिए लड़का देखती है, तो वह ऐसा घर ढूंढती है जहां उसे कुछ न करना पड़े। हमें लड़कियों को यह समझाना होगा कि घर का काम करना या परिवार की सेवा करना कोई गुलामी नहीं, बल्कि भारतीय समाज का आधार है।
बेटों का पलायन: मजबूरी या ट्रेंड?
जब समाज का नौजवान ये सब देखता है कि उसके बड़े भाई या पड़ोस के दुकानदार लड़के को शादी के लिए अच्छी लड़की नहीं मिल रही, तो वह डर जाता है। उसे लगता है कि अगर उसने बाप की गद्दी संभाली, तो वह भी कुंवारा रह जाएगा या उसे कोई सीधी-सादी, अनपढ़ लड़की मिलेगी।
फिर वो पापा पर दबाव बनाना शुरू करता है- 'पापा, मुझे ये दुकानदारी नहीं करनी। मुझे एमबीए करना है, मुझे सीए बनना है। मुझे डॉक्टर बनना है तो इंजीनियर बनना है' पिता भी समाज में अपनी नाक ऊंची रखने के लिए उसे किसी महंगे प्राइवेट कॉलेज में डाल देते हैं। जैसे ही बेटे के हाथ में डिग्री आती है और उसे किसी शहर में नौकरी मिलती है, घर में खुशियां मनाई जाती हैं।
लेकिन सच तो ये है कि उस दिन उस घर के बिजनेस की मौत हो जाती है। लड़का एक बार नौकरी की लाइन में लगा, तो उसका अपनी मिट्टी और अपनी दुकान से नाता टूट गया। वो अब ताउम्र किसी और के लिए काम करेगा, किसी और का टार्गेट पूरा करेगा।
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हैरानी की बात तो ये है कि हम बनिया समाज के लोग खुद ही अपनी जड़ें काट रहे हैं। ये कैसी विडंबना है कि हम अपनी बेटी के लिए नौकरी वाला लड़का ढूंढते हैं, और जब हमारे बेटे को लड़की नहीं मिलती, तो हम दुखी होते हैं। अगर हम खुद अपनी बेटी को एक बिजनेसमैन के घर भेजने में गर्व महसूस नहीं करेंगे, तो समाज के दूसरे लोग क्यों करेंगे?
हमने खुद 'सेठ' के सम्मान को 'साहब' की कुर्सी के नीचे दबा दिया है। हमने पैसे से ज्यादा 'पद' को महत्व देना शुरू कर दिया है, जबकि हम जानते हैं कि पद आज है कल नहीं, पर अपना धंधा सदा साथ रहता है।
अगर हम चाहते हैं कि हमारा समाज फिर से वही समृद्ध और प्रभावशाली समाज बने, तो हमें ये 3 काम करने होंगे:
अपनी मानसिकता बदलें: अपनी बेटी के लिए लड़का देखते वक्त उसकी 'सैलरी' नहीं, बल्कि उसका 'साम्राज्य' और उसका 'स्वभाव' देखें। एक बिजनेसमैन लड़का आने वाली सात पुश्तों को पाल सकता है, जबकि एक नौकरी वाला सिर्फ अपनी रिटायरमेंट तक की सोच सकता है।
बिजनेस को मॉडर्न बनाएं: अगर लड़कों को लगता है कि दुकान पर बैठना 'बोरिंग' है, तो उन्हें बिजनेस को नया लुक देने दें। उन्हें एसी लगवाएं, कंप्यूटर लगवाएं, ऑनलाइन मार्केटिंग करने दें। जब बिजनेस में 'ग्लैमर' आएगा, तो लड़कियां भी वहां आने में शर्म महसूस नहीं करेंगी।
पारिवारिक संस्कार वापस लाएं: अपने बच्चों को शुरू से ही संयुक्त परिवार के फायदों के बारे में बताएं। उन्हें सिखाएं कि सबके साथ मिलकर रहने में जो ताकत है, वह अकेलेपन में कभी नहीं मिल सकती।
भाइयों और बहनों, ये सिर्फ एक शादी का मसला नहीं है, ये हमारे वजूद का मसला है। अगर इसी तरह हमारे लड़के शादियों के चक्कर में बिजनेस छोड़कर नौकरी की तरफ भागते रहे, तो आने वाले 20-30 सालों में बनिया समाज की पहचान खत्म हो जाएगी। हमारी आलीशान दुकानें और शोरूम्स दूसरों के हाथों में होंगे और हमारे बच्चे उनके यहां मैनेजर बनकर फाइलें ढो रहे होंगे।
हमें अपनी सोच बदलनी होगी। हमें अपनी बेटियों को भी ये सिखाना होगा कि ज्वाइंट फैमिली कोई बोझ नहीं, बल्कि एक सुरक्षा है। हमें अपने बेटों को गर्व दिलाना होगा कि वे 'मालिक' हैं, 'नौकर' नहीं। जिस दिन हमारे समाज की बेटियां और उनके मां-बाप गर्व से ये कहेंगे कि 'हमें अपनी बेटी के लिए एक काबिल बिजनेसमैन लड़का चाहिए', उस दिन हमारा समाज फिर से सोने की चिड़िया बनेगा।
याद रखिए, नौकरी से घर चलता है, पर व्यापार से साम्राज्य खड़ा होता है। शादी के छोटे से स्वार्थ के लिए अपनी सदियों पुरानी विरासत का गला मत घोंटिए। इस मुद्दे पर आप क्या सोचते हैं? अपनी बात नीचे कमेंट में जरूर लिखें।
जय कमलापुरी!
- हितेन्द्र गुप्ता
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