महासभा में आमलोगों की सक्रिय भागीदारी क्यों नहीं? हर परिवार को एक वोट देने का अधिकार क्यों नहीं?

अगले साल 7 जनवरी, 2024 को अखिल भारतीय कमलापुरी वैश्य महासभा का महाधिवेशन होना है। महाधिवेशन बिहार के सुपौल जिले के वीरपुर में होना तय हुआ हैं। 7 जनवरी का समय तय करने के पीछे इनलोगों की मंशा सिर्फ यही है कि खरमास और ठंड का समय होने के कारण दुकानदारी- बिजनेस पर कुछ ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। लेकिन कड़ाके की ठंड में महाधिवेशन का आयोजन किसी लिहाज से सही नहीं कहा जा सकता।


वैसे भी दूर-दराज का इलाका होने के कारण बिहार से बाहर दिल्ली, नोएडा, लखनऊ, कानपुर, मुंबई, सूरत, कोलकाता, ओडिशा, छत्तीसगढ़, असम के कम ही लोग आएंगे। साथ ही ठंड के समय में फ्लाइट-ट्रेन सेवा भी प्रभावित रहती है। इस मौसम में लोग सर्दी-कफ-खांसी के कारण घर से कम ही निकलते हैं। ऐसे में पदाधिकारियों के अलावा महाधिवेशन स्थल के आसपास रिश्तेदारी रहने वाले हीं ज्यादातर लोग जा सकते हैं। इससे बाहरी आम लोगों की भागीदारी कम ही रहने की संभावना है। 

मान लीजिए दिल्ली से किसी को वीरपुर जाना है तो ट्रेन-बस से दो दिन जाने और दो दिन आने में लगेंगे। इसके साथ दो-तीन दिन वीरपुर में रहना यानी पूरे Five Day Week की छुट्टी। फ्लाइट से जाना हो तो दरभंगा करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर है। फिलहाल दिल्ली से दरभंगा तक 6 जनवरी को डायरेक्ट फ्लाइट से एक तरफ का किराया 14000 के करीब है और वापसी में 8 जनवरी का एयरफेयर 13 हजार रुपये का है। दरभंगा एयरपोर्ट से वीरपुर आने-जाने का टैक्सी किराया करीब 5 हजार रुपये लगता है। इतना खर्च करके कौन जाना पसंद करेगा वो भी तब, जब वोट ही ना देना हो। इसलिए महाधिवेशन का आयोजन आमतौर पर उन जगहों पर किया जाना चाहिए जहां देश के सभी इलाके से लोगों को आने-जाने में आसानी रहे। जहां सभी तरह के लोगों के रहने की बेहतर व्यवस्था हो, लेकिन आपकी फिक्र आखिर है किसे?


महासभा में आम लोगों की कम भागीदारी का एक कारण आम लोगों को वोट देने का अधिकार नहीं होना भी है। आपको मालूम ही होगा कि महाधिवेशन के दौरान सिर्फ अखिल भारतीय कमलापुरी वैश्य महासभा के अध्यक्ष का चुनाव होता है। उपाध्यक्ष, महामंत्री या अन्य पदाधिकारियों का चुनाव नहीं होता है। इनका चयन होता है। प्रादेशिक सभा के प्रतिनिधि के साथ ये चयनित या मनोनीत व्यक्ति कार्यसमिति-केंद्रीय परिषद के सदस्य होते हैं और सिर्फ यहीं लोग अध्यक्ष चुनाव में वोट दे सकते हैं।

वर्तमान अध्यक्ष का कार्यसाल 5 साल का था, लेकिन चुनाव आठ साल के बाद हो रहे हैं। इस चुनाव में हम-आप वोट नहीं दे सकते। वोट सिर्फ खास लोग ही दे सकते हैं। साफ है जब वोट देने वाले लोग या प्रादेशिक सभा के प्रतिनिधि या फिर अध्यक्ष द्वारा मनोनीत व्यक्ति होंगे तो क्या वो उनके खिलाफ वोट देंगे। या तो अध्यक्ष जी खुद चुनाव लड़ेंगे या फिर अपने ऐसे व्यक्ति को चुनाव में खड़ा करेंगे जो उनके कहे अनुसार ही काम करे। ऐसे में कमलापुरी समाज के आम लोगों की भूमिका क्या रह जाती है? कुछ लोग वर्षो से अपने लोगों- रिश्तेदारों का चयन कर महासभा को रिमोट कंट्रोल की तरह चलाते रहते हैं

आप ये जानकर आश्चर्य में पड़ जाएंगे कि लाखों की जनसंख्या वाले कमलापुरी समाज में सिर्फ सवा सौ लोगों को वोट देने का अधिकार है। उसमें से सिर्फ 50-55 लोग ही वोट देने आते हैं। दूर-दराज में बैठक होने के कारण कम ही लोग आते हैं। वीरपुर से 8 साल पहले केवटी महाधिवेशन के दौरान अध्यक्ष चुनाव में सिर्फ 55 लोगों ने वोट किया था...जी सिर्फ 55 लोगों ने। ऐसे में जन भागीदारी बढ़ाने के लिए "एक परिवार-एक वोट" की वोट की मांग की जा रही हैं तो उसे खारिज कर दिया जा रहा है।


इस को लेकर करीब एक साल से विभिन्न व्हाट्सएप ग्रुप और सोशल मीडिया पर हर परिवार से कम से कम एक व्यक्ति को मतदान का अधिकार देने की मांग की जा रही है। शिवहर और पचकपड़ी में हुई बैठक में भी इस बारे में मांग की गई, लेकिन कमलापुरी संविधान में इसका प्रावधान ना होने की बात कर इसे ठुकरा दिया गया। जब लोगों ने कहा कि इसके लिए संविधान में संशोधन किया जाए, तो सीधे तौर पर वोटिंग का अधिकार देने से मना कर दिया गया। साफ कहा गया कि चुनाव से पहले किसी तरह का संशोधन नहीं होगा।

जबकि आपको जानकर हैरानी होगी कि संविधान बनने के बाद कई संशोधन हो चुके हैं और केवटी महाधिवेशन से एक दिन पहले भी संविधान के नियमों में संशोधन किया गया था। सवाल उठता है कि जब भारत के संविधान में संशोधन हो सकता है तो आम लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कमलापुरी महासभा के संविधान में क्यो नहीं ? जबकि संविधान में भी नियम 27 के तहत संशोधन का प्रावधान दिया गया है कि किस तरह किया जा सकता है। ये कोई असंभव चीज नहीं है जो ना हो सके।



इसी सबको लेकर लोगों ने जब व्हाट्सएप और सोशल मीडिया के माध्यम से "एक परिवार-एक वोट" की मांग उठाई गई तो अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महामंत्री तो चुप्पी साधे रहे लेकिन उनके बचाव में या कहिए कि चुनाव में आम लोगों की भागीदारी को रोकने के लिए कुछ ऐसे लोग सामने आए जिनको समाज के ज्यादातर लोग पिछले आठ साल से जानते तक नहीं थे। ये लोग और कोई नहीं महासभा के ही कार्यसमिति और केंद्रीय परिषद के पदाधिकारी लोग हैं। आखिर इन्हें भी तो अपनी निष्ठा- आस्था दर्शानी है। निष्ठा दिखाने पर ही तो आगे फिर पदाधिकारी बने रहने का द्वार खुला रहता है।

इन्हीं में कमलापुरी समाज के एक सम्मानित व्यक्ति जो अखिल भारतीय कमलापुरी वैश्य महासभा कार्यसमिति-केंद्रीय परिषद के सदस्य हैं। आजकल चुनाव आते ही काफी मुखर और एक्टिव हो गए हैं। इनके पिताजी भी महासभा के पदाधिकारी थे। हो सकता है ये अपने इलाके में सक्रिय हों, लेकिन कमलापुरी समाज के आम लोग इनके बारे में नहीं के बराबर जानते है। समाज के ज्यादातर लोग इनके नाम से भी अपरिचित हैं।

सोशल मीडिया पर अब जब चुनाव से पहले एक बार फिर "एक परिवार-एक वोट" की मांग पकड़ने लगी तो इन्होंने लिखा कि "देश की आबादी 140 करोड़ है लेकिन उनकी आवाज देश के जुड़े हुए सांसद प्रतिनिधि लोकसभा में उठाते हैं। अगर किसी को महासभा के सदस्यों द्वारा तार्किक रूप से महासभा की बैठक में प्रेषित करने का काम होता और उसपर विचार होता है। 1915 में लगाया गया यह वृक्ष 2023 तक पहुंचा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था है। जिसको चुनाव लड़ना है वह अपना पर्चा भरे और मैदान में आए। इस तरह आलोचना नहीं करनी चाहिए। कमलापुरी समाज वैधानिक पद नहीं है। जिसको नहीं निज देश और जात का अभिमान वह नर नहीं निरा पशु और मृतक समान है। कुछ लोगों का अवतार सिर्फ आलोचना के लिए हुआ हैं।"

उनके विचार पर उन्हें लोगों से कैसी प्रतिक्रिया मिली ये भी देख लीजिए। लोगों मे कहा कि "अच्छा लगा कि जैसे भी हो आप यहां अपना विचार रखने के लिए आगे आए। नहीं तो सोशल मीडिया, व्हाट्स एप पर कुछ लोगों द्वारा जागरूकता लाने से पहले आप जैसे ज्यादातर लोग एक तरह से सोए ही हुए थे। आपको उन्हें धन्यवाद देना चाहिए कि उनके कारण लोग समाज की भलाई के लिए सोचने के लिए मजबूर हुए हैं, उनके द्वारा उठाए गए मु्द्दों के कारण कमलापुरी समाज के लोग अब ये विचार करने के लिए विवश हुए हैं कि जिन्हें हम वर्षों से अपना प्रतिनिधि बनाए हुए हैं वो तो हमारे लिए कुछ काम ही नहीं कर रहे हैं।"

एक अन्य जवाब में कहा गया कि, "जिसको आप आलोचना कह रहे हैं, ये उन्हीं के लाए जागरूकता का प्रमाण है कि आपकी तरह ही समाज के लोग जो महासभा या कमलापुरी समाज को लेकर कभी अपना विचार नहीं रखते थे, अब अपना पक्ष रखने के लिए आगे आने लगे हैं। आपने कहा कि 1915 में लगाया गया वृक्ष 2023 तक पहुंचा है लेकिन अगर आप निष्पक्ष तरीके से देखेंगें तो पाएंगे कि आज वो वृक्ष किस हाल में है। महासभा ने उस वृक्ष का क्या हाल बना रखा है। महासभा के माली उस वृक्ष की देखभाल तो दूर उसमें खाद की जगह मट्ठा डाल कर बैठे हैं। और अब कुछ लोग जब उस वृक्ष को उपवन में बदलने की बात कर रहे हैं तो  आप जैसे लोग उसे आलोचना बता कर खारिज कर रहे हैं।"


व्हाट्सएप पर ही उन्हें जो आईना दिखाया गया वो इस तरह से है- "आपने कहा कि जिसे चुनाव लड़ना है पर्चा भरे और आ जाए मैदान में, लेकिन क्या आपको लगता है कि पर्चा भरने और मैदान में आ जाने के बाद भी आप चुनाव जीत सकते हैं?...नहीं! क्योंकि आपको वोट देने वाले सिर्फ गिने-चुने करीब सवा सौ लोग है। लाखों की आबादी वाले कमलापुरी में से सिर्फ सवा सौ लोग वोट देते हैं और उसमें से भी ज्यादातर लोग चयनित होते हैं। फिर भला वो आपके लिए वोट क्यों करेंगे? ऐसे में लोग अगर एक परिवार-एक वोट की मांग कर रहे हैं तो इसमें गलत क्या है? इस मांग पर आप विचार भी नहीं करेंगे और भला-बुरा भी कहेंगे। ये तानाशाही नहीं तो क्या है?

आगे के जवाब में कहा गया कि "आपने ये भी कहा कि जिसको नहीं निज देश-जात का अभिमान... तो ये जात के प्रति अभिमान ही है जो यहां कुछ लोग खुलकर बोल रहे हैं। सही को सही और गलत को गलत कह रहे हैं। नहीं तो आपके जैसे लोग तो वर्षों से सो ही रहे थे और अब भी सो रहे हैं। इन सोए लोगों के कारण ही पिछले 12 और 8 साल= 20 साल से कुछ लोग महासभा में जमे हुए हैं और काम भी नहीं कर रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि समाज में आपके जैसे कुछ लोग हैं जो उनके बचाव के लिए आगे आएंगे और उनका पक्ष रखेंगे।"

इसके बाद उन्हें यह भी कहा गया कि "जिसे आप आलोचना कह रहे हैं वो महासभा के लोगों को गाली नहीं बल्कि कमलापुरी समाज में बदलाव लाने के लिए अच्छे विचार और सुझाव हैं। इनको लागू कर या अमल में लाकर कमलापुरी समाज में लोगों की भागीदारी बढ़ा सकते हैं इसलिए आलोचना और सलाह-सुझाव में फर्क समझिए। अच्छे विचार कहीं से भी आए, उस फीडबैक पर गंभीरता से विचार करें"

सोशल मीडिया पर "एक परिवार-एक वोट" की मांग पर महासभा की ओर से और लोग भी विरोध कर रहे हैं। वे ना तो पिछले 8 साल की उपलब्धियों को बताने के लिए तैयार हैं ना कमलापुरी समाज की ओर से दिए गए 18 सुझावों पर विचार करने को तैयार हैं। आपको हैरानी होगी कि कई लोग आज से नहीं वर्षों से महासभा से जुड़े हुए हैं। वे कार्यसमिति में हैं, पदाधिकारी बने हुए हैं लेकिन उनसे कमलापुरी समाज के प्रति किसी उपलब्धि बताने को कहिए या फिर पिछले 20 साल के काम के बारे में पूछिए तो तमसा जाएंगे, फायर हो जाएंगे। उनको लगता है कि ये पूछने वाला कौन होता है? संविधान में संशोधन करने की बात करने वाला कौन होता है?

आप ये जानकर भी हैरत में पड़ जाएंगे कि आठ साल हो जाने के बाद भी कई प्रादेशिक सभा का गठन नहीं हो पाया है। बिहार प्रादेशिक सभा के गठन की जिम्मेदारी पिछले 8 साल से कार्यसमिति-केंद्रीय परिषद में शामिल एक पदाधिकारी को दी गई है। चुनाव से पहले प्रादेशिक सभा के गठन की प्रक्रिया को आप क्या कहेंगे? प्यास लगने पर कुआं खोदना! भोज के समय कुम्हड़ रोपना! लेकिन आप अगर इसपर कुछ पूछगे, कुछ सलाह-सुझाव देंगे तो उसपर विचार करने के बजाय उसे अनसूना कर देंगे।

शिवहर-पचपकड़ी की बैठक में भी सलाह-सुझाव देने वाले लोगों का मजाक उड़ाया गया। अब आप ही इन 18 सुझावों को देखिए और विचार करके बताइए कि जो सुझाव दिए गए हैं या महासभा से जिसे लागू करने की मांग की गई है वो कमलापुरी समाज की भलाई के लिए है या नहीं? अगर आपको लगता है कि ये मांग या सुझाव सही है तो अपना विचार रखिए और इसे दूसरे कमलापुरी भाइयों को भी पढ़ाइए।

इन 18 सुझावों को पढ़ने के लिए इस लिंक को क्लिक करें- अखिल भारतीय कमलापुरी वैश्य महासभा महाधिवेशन से पहले 18 सुझाव

अपना विचार नीचें कमेंट बॉक्स में जरूर दीजिएगा।

यह वेबसाइट www.kamlapuriparivar.com कमलापुरी परिवार के सभी लोगों के लिए समर्पित है। यहां आप परिवार में हो रहे बर्थडे, तीज-त्योहार, शादी-विवाह, उत्सव से संबंधित खबरें और फोटो भेज सकते हैं। आपके पास वैश्य समाज से संबंधित कोई भी जानकारी है तो लिख कर फोटो के साथ मुझे guptahitendra @ gmail. com पर भेज दें। यहां नीचे कमेंट बॉक्स में अपना कमेंट/ विचार / सलाह जरूर लिखें 

धन्यवाद- हितेन्द्र गुप्ता 

Comments

  1. ,क्या आप लोगों ने कभी सुना है, देखा है कि आम सदस्य केंद्रीय परिषद के सदस्य के चुनाव में भाग लेते हैं या अन्य प्रतिनिधियों के निर्वाचन में भाग लिए हैं? जबकि महासभा के संविधान में इसके लिए विधान है। प्रत्येक इकाई स्थानीय सभा अपने सदस्यों में से कुल सदस्य संख्या के हर 15 पर एक के अनुपात से अधिक से अधिक 10 प्रतिनिधियों का निर्वाचन करेगी। ऐसे प्रतिनिधि महासभा के केंद्रीय परिषद का निर्माण करते हैं। यह सब प्रादेशिक सभा के भी सदस्य होते हैं। लेकिन अधिकांश केंद्रीय परिषद के सदस्य पुर्व या वर्तमान अध्यक्ष के द्वारा मनोनीत हैं, कुछ स्थाई सदस्यों को छोड़कर। यह कृपा पात्र अथवा संबंधी सदस्य महासभा के पदाधिकारी के साथ गुटबंदी में उनका सहयोग करते हैं और आज भी यही प्रोजेक्ट वीरपुर के लिए चल रहा है। पटना और मधुबन से घोड़े छोड़े जा चुके हैं गुटबंदी के लिए,परिवारवाद के लिए। लोगों ने महासभा को विकृत होते हुए संविधान को कुचले जाते हुए और समाज को बिखरते हुए देखा है। किसी को 12 साल अध्यक्ष तो किसी को 8 साल रहते हुए देखा है, संविधान की धज्जियां उड़ गई है। आज भी 75- 80 प्रतिशत लोगों को संविधान के बारे में कुछ भी नहीं मालूम है। सुदूर गांव देहात में महासभा के बारे में जानकारी नहीं है। इन्हीं सब बातों के मद्देनजर मैंने और बहुत सारे लोगों ने सुझाव दिए हैं जिससे एक मजबूत और अनुशासित महासभा और संगठित व एकता के सूत्र में बंधे हुए समाज का निर्माण हो सके।
    प्रो डा राजकुमार गुप्ता

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  2. आपके विचार का सम्मान करते हैं
    बहुत अच्छी सोच
    🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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